स्वयं के हाथ से काम करने का महत्व! सुविधाओं की भरमार में छिपा शहरी अवसाद, क्या खुद का काम करना जरूरी है?

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सुविधाओं की भरमार में छिपा शहरी अवसाद: क्या खुद का काम करना जरूरी है?

आज के विषय पर कुछ सवालों के उत्तर हम "Siddharth Tabish" के Facebook वॉल से जाने-

आज के विचारों के कुछ मुख्य बिंदु:

  • स्वयं के हाथ से काम करने का महत्व
  • एक स्वस्थ और आत्मनिर्भर जीवन की कुंजी
  • कर्म और खुद की मेहनत की आवश्यकता, शहरों में अवसाद के पीछे का सच
  • शहर और गांव की जीवनशैली में अंतर
  • आत्मनिर्भरता 
  • स्वयं के हाथों से काम करना सीखें और बदलें अपने जीवन को

Siddharth Tabish Writer

Image Credit: @SiddhartTabish FB

शहर के लोग जो ज्यादा संपन्न होते हैं, वो बड़े गर्व से आपको बताते मिलेंगे कि “उन्हें चाय तक बनाना नहीं आता है”.. संपन्न लोगों के टीवी शो आते हैं जिनमें वो खाना वगैरह बनाना सीखते हैं.. वो “आटा” पहली बार छूते हैं और इतने आश्चर्य से हर एक सब्ज़ी को काटेंगे जैसे ये इनके दैनिक जीवन का हिस्सा ही नहीं रहा हो कभी.. अब मध्यम वर्गीय घरों में भी जो लोग थोडा संपन्न हो जाते हैं वो सबसे पहले किचन में जाना छोड़ते हैं उसके बाद अपने बाक़ी काम भी अपने हाथ से करना बंद कर देते हैं.. संपन्न और आधुनिक होने की ये सबसे बड़ी पहचान है कि आप अपने हाथ से अपना कोई काम न करें

और फिर यही लोग पागलों की तरह दिन रात दूसरे वो सारे काम करेंगे जिस से इन्हें पैसा मिलेगा.. कंप्यूटर और किताबों में पर बैठ कर आँख फोड़ते रहेंगे पूरे दिन सिर्फ़ इसलिए ताकि इन्हें अपना खाना अपने हाथ से न बनाना पड़े.. फिर जिम, हेल्थ क्लब और योग क्लास ज्वाइन करेंगे.. और फिर अपना वो पैसो को दूसरों को देते हैं जो इनके लिए खाना बनाएगा, इनका घर संभालेगा, इन्हें योग कराएगा, इनकी हेल्थ अच्छी रखेगा.. करोड़ों की गाड़ी खरीद के ये ड्राईवर से उसे चलवाते हैं.. सोचिये ज़रा

हम सारे इन्सान अपने  हाथ से शिकार करने या अन्न बोने और उसे पका के खाने के लिए पैदा होते हैं.. अपने जीवन के दैनिक कार्यों की ज़िम्मेदारी हमारी स्वयं की होती है.. कोई हमें पका के खिलाने के लिए नहीं पैदा होता है.. अपने हाथ से खाना पका लेना एक “उपलब्धि” होती है हमारी.. अगर आपको अपने लिए भी खाना बनाना नहीं आता है तो इसका मतलब ये है कि आप जीवन में दरअसल जो करने आये थे वो बिना करे ही चले जायेंगे इस दुनिया से..अपने बच्चों को और स्वयं को आपको ही पालना होता है 

जो लोग अपना काम स्वयं करना जानते हैं उनमे आप मानसिक रोग जल्दी नहीं पायेंगे.. गावों में आपको बहुत कम लोग अवसाद से पीड़ित मिलेंगे.. जबकि शहरों में हर दूसरे घर में, खासकर औरतें आपको अवसाद और दूसरी मानसिक बिमारी से ग्रस्त मिलेंगी..  शहरों में अवसाद ज़्यादातर इसीलिए होता है क्यूंकि सुवुधायें तो सारी हैं मगर करने को कुछ नहीं है.. आपका सारा काम कोई दूसरा कर रहा है तो फिर आपका दिमाग़ तो चलेगा ही क्यूंकि वो जो फल मेवे खा कर आपके शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा मिल रही है वो कहीं निकल तो रही नहीं है

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