बदलते समय के साथ बदलते रिश्तों की कहानी - रिश्तों की डोर

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बदलते समय के साथ बदलते रिश्तों की कहानी -

रिश्तों की डोर

A Tale of Evolving Relationships with Changing Times, The Thread of Relationships

Image Credit: fulldhamaal

एक समय की बात है, एक छोटे से शहर में एक दम्पति रहते थे, शीला और सुरेश। वे दोनों विवाह के शुरुआती दिनों में बहुत प्रेम से रहते थे, लेकिन कुछ सालों बाद ही शीला को ये लगने लगा जैसे पति उसकी कोई फिक्र नहीं करता।

उसे ये बात खटकने लगी कि पति रोज़ ऑफ़िस से आता है और आराम से टीवी देखने लगता है और घर के काम में कोई मदद नहीं करता। उसे बस अपने ही काम से मतलब था। घर का काम इतना होता कि शीला थक जाती और मन में सोचती कि काश उसको भी ऐसा आराम होता कि बस कोई उसे सब करके दे देता, और वह आराम से खाना खाती, टीवी देखती और सो जाती।

धीरे-धीरे उसने सुरेश को बोलना शुरू किया कि मुझसे काम नहीं होता, थोड़ा तुम भी करो मैं अब नहीं करूंगी। सुरेश को लगा कि शायद अब बात नहीं बनेगी तो वह उसकी मदद करने लगा घर के काम में। शीला को लगने लगा कि वह ही क्यों घर पर रुके और बच्चों को देखें। क्यों न वह भी नौकरी करें।

तो उसने नौकरी ढूंढना शुरू किया और एक अच्छी जगह नौकरी कर ली। अब घर आकर वह ये सोचती कि घर का काम क्यों करें, तो फिर एक फुल टाइम मेड रख ली। ऐसे ही जीवन चलने लगा। अब तो शीला को यह लगने लगा कि वह किसी से कम नहीं है, तो फिर वह सुरेश को नीचा दिखाने में लगी रहती, ताने मारना तो उसकी आदत सी हो गई।

पर सुरेश इन बातों से धीरे-धीरे अंदर से उदास रहने लगा। उसे लगा कि अगर वह शीला को कुछ कहेगा तो उसका घर टूट जाएगा। वह सारी बातें चुपचाप सुनता रहता था और सोचता रहता था कि काश शीला को कभी समझ आए कि वह कितना अकेला पड़ गया है

और अब वह सच में इन सब से दूर चला जाना चाहता है....लेकिन बस ये रिश्तों की डोर...

फुलधमाल प्रेरणा श्रोत -

अगर हमें समझना है कि प्रेम में सच्चाई क्या है, तो हमें समझना होगा कि सच्चा प्यार में व्यक्ति को आज़ादी मिलती है। यह वह उत्साह और सहारा है जो हमारे पार्टनर को उनकी तरक़्क़ी और स्वतंत्रता के लिए प्रोत्साहित करता है। सच्चे प्यार में, हम अपने पार्टनर के व्यक्तित्व का समर्थन करते हैं, जिससे वह अपने जीवन को स्वतंत्र रूप से जी सके। इस तरह, सच्चा प्यार हमें और हमारे पार्टनर को आज़ादी और खुशी से जीने देता है, किसी प्रतिबंधित या बाधा के बिना।

सच मानिए, जितना आप बंधन मुक्त होना चाहते हैं, उतना ही आपका साथी भी चाहेगा। अगर सामाजिक बंधन के साथ रहना है तो प्रेम से रहिए और अपने साथी को भी जीने दीजिए। यही है असली प्रेम की डोर, वरना आगे बस अवसाद और अधेरा ही है।

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