नफ़रत नहीं, नशा है ये .. और ये नशा बहुत गहरा है

  जबड़ा फाड़ You are here
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This hate is not just hate, it's a drug

Image Credit: FullDhamaal.com


मैं इस्लाम में फैली कुरीतियों पर लिखता हूँ क्यूंकि मुझे “मुसलामानों” की चिंता है.. उनसे नफ़रत नहीं.. इसलिए आप अपनी "सीखी हुई नफ़रत" से मेरी "चिंता" की तुलना न किया कीजिये

आपको "मुसलमानों" के प्रति नफ़रत सिखाई गयी है.. मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ है.. मुझे उनकी कुरीतियों की चिंता है.. वो कुरीतियां आपमें भी उतनी ही हैं, या ये कहें कि अब उनसे ज़्यादा हैं.. इसलिये आप मेरी एक पोस्ट जो "अंधविश्वास और कुरीति" न हट पाने की खीझ से भरी होती है, जब ले कर उड़ लेते हैं तो पोस्ट जिस मकसद से लिखी गयी होती है उसका सारा मक़सद बेकार हो जाता है.. क्योंकि वो आपके परिवार और ख़ानदान के बीच पहुंच जाती है.. आप कभी सोचते हैं कि "इस्लाम या मुसलमानों" के भीतर फैले अंधविश्वास या कुरीति की पोस्ट आप अपने परिवार, समाज और ख़ानदान के व्हाट्सएप्प ग्रुप और फ़ेसबुक पर क्यूं शेयर करते हैं? कुछ अंदाज़ा है आपको आप ये क्यूं करते हैं?

रुकिए मैं समझता हूँ आपको....

आपको पूरी तरह से तैयार किया गया है एक ख़ास समाज और धर्म से नफ़रत करने के लिए.. इसमें महज़ कुछ बरस लगे हैं.. आपकी ये ट्रेनिंग बाक़ायदा व्हाट्सएप्प पर हुई है.. आपको इस "नशे" की मनोवैज्ञानिक आदत डलवाई गयी है.. और इस नशे की अब आपको इतनी ज्यादा आदत लग चुकी है कि इसके बिना चैन नहीं मिलता है अब आपको

इसका जीता जागता उदाहरण आप इस आपदा में अपने न्यूज़ चैनल के माध्यम से देख सकते हैं.. आपके न्यूज़ चैनल पूरी तरह से पैसा कमाने वाले बिज़नेस मॉडल पर चलते हैं.. वो वही कंटेंट दिखाते हैं जिस से उनकी TRP बढ़े.. और आप देखिये इस आपदा में आपको वो क्या दिखा रहे हैं? हर दूसरी ख़बर में वो कोरोना को "जमात" से जोड़कर दिखाते हैं.. मुस्लिम इलाकों से तीन गुना ज़्यादा दूसरे  सम्प्रदायों के इलाक़े में डॉक्टर और स्वास्थ टीम पर हमले हो चुके हैं.. मगर चैनल सिर्फ़ छांट कर आपको “मुस्लिम” इलाकों की वारदातें दिखाता है.. क्यूंकि आपको वही देखना है.. जो चैनल आपको ये वाला नशा नहीं देते हैं आप उस चैनल को बदल देते हैं.. तो उन्हें मजबूरन ढूंढना पड़ता है हर जगह "मुस्लिम" एंगल.. औसत अगर आप जोड़ेंगे तो ये "दस" मिनट का निकलेगा.. दस मिनट के भीतर अगर कोई चैनल "मुसलमान" को दोषी न बताए किसी भी बात के लिए तो वो चैनल नहीं चल पाएगा.. मुसलमान का कहीं न कहीं नाम आना चाहिए.. यहां का न मिले तो पाकिस्तान या बांग्लादेश के भी चलेगा.. जो चैनल ये नहीं करेगा उसकी TRP गर्त में चली जायेगी

उदाहरण के लिये NDTV है.. गर्त में TRP होती है जबकि आपदा में क्या करना है, कैसे जीना है, आगे किस तरह बचाव करना है सब वही दिखाता है.. बिना किसी शोर शराबे और सुकून के साथ.. जिसकी इस वक़्त आपको और हमको ज़रूरत है.. मगर आपको ये नहीं सुनना है.. आप हम सबको समझाते हैं कि इस आपदा में एक हो जाओ और प्रधानमंत्री और सरकार का सपोर्ट करो.. मगर आप क्या करते हैं? आप ने आपदा की चिंता में कब NDTV देखना शुरू किया? नहीं आप नशा नहीं भूले हैं इस आपदा में.. आप वही देखेंगे जहां आपको "नशा" मिलेगा.. तो आप अपना नशा जारी रखेंगे भले जान चली जाए

इस नशे का अब ये आलम हो चुका है कि अब आपको लगभग सब कुछ दिखना बन्द हो चुका है

मेरे साथ मेरा एक दोस्त है.. सब कुछ उसके लिए मैंने किया.. बिज़नेस में मेरे साथ है वो.. उसका परिवार इस बात को जानता और समझता है और मुझे बेटे जैसा मानता है.. मगर हर दूसरे दिन उस परिवार के किसी न किसी सदस्य के व्हाट्सएप्प स्टेटस पर भद्दे भद्दे मुसलमानों से घृणा करने वाले मैसेज लगे होते हैं.. अभी दो दिन पहले उसी परिवार की भाभी ने अपना व्हाट्सएप्प स्टेटस लगाया था जिसमें एक टोपी लगाया हुआ सांप ज़हर थूक रहा था.. मेरे दोस्त ने मुझे दिखाया और फिर उसने अपनी भाभी को फ़ोन किया.. उन्होंने वो स्टेटस हटा दिया.. मगर कहाँ तक किस से कहे मेरा दोस्त? आज भाभी तो कल भाई, फिर बहन, फिर मामा फिर मामी.. हर कोई कुछ न कुछ इस तरह के स्टेटस लगये रहता है.. वो इस बुरी तरह से इस नशे में हैं कि जहां किसी भी मुसलमान ने उनके साथ कभी भी कुछ ग़लत नहीं किया हुआ है, इसके बावजूद वो नशे में ऐसे स्टेटस लगाते हैं, ऐसे वीडियो आपस में शेयर करते हैं.. बिना ये सोचे या समझे कि उनके मिलने जुलने वालों में "मुसलमान" भी हैं.. ये इसको अब ग़लत समझते ही नहीं हैं.. ये नशा बहुत ज़्यादा मज़ा देने लगा है अब 

फ़ेसबुक पर मेरे एक अज़ीज़ दोस्त भी ऐसे ही हर दूसरी पोस्ट मुसलमानों से जुड़ी करते थे.. कटाक्ष और घृणा वाले पोस्ट.. जिसमे वो इमेज के माध्यम से पंचर बनाने वालों या ऐसे ही किसी व्यक्ति का किसी घटना से जोड़कर मज़ाक बनाते थे.. मैंने जब इस पर एक बार एतराज़ जताया तो भड़क गए.. लोगों से पूछने लगे कि बताओ इसमें ग़लत क्या है? उनकी लिस्ट में सब उनके ही जैसे थे.. किसी को कुछ ग़लत नहीं दिख रहा था.. कइयों ने मुझे कहा कि मैं जिहादी हूँ छिपा हुआ इसलिये मुझे ग़लत लग रहा है ये सब.. उन साहब ने फिर मुझे ब्लॉक कर दिया क्यूंकि उनके "नशे" में मैं रुकावट बन रहा था.. नशेड़ी नशे के लिए अपना घर बार त्याग देता है तो दोस्ती क्या चीज़ है भला?

जो ये नशा आपको परोसते हैं, वो शुरू से यही चाहते थे कि आप का "मुसलमानों" से संबंध एकदम ख़त्म हो जाये.. मुसलमानों से दोस्ती यारी तक के लिए वो विरोध करते हैं.. पांच साल पहले फेसबुक पर ही मेरी दोस्त हैं एक.. उनके मिलने जुलने वाले और रिश्तेदार उनके इसलिए पीछे पड़ गए कि वो मेरा लेखन पसंद करती थीं.. दिन रात उन्हें डराया धमकाया गया इसके लिए.. मगर उन्होंने मुझ से दोस्ती नहीं तोड़ी.. ये लोग इसलिए आपको “मुसलामानों” से दोस्ती करने से रोकते हैं क्योंकि आपका एक भी दोस्त या कोई मिलने जुलने वाला मुसलमान होगा तो कभी न कभी आपको सोचना ही पड़ेगा ऐसी भद्दी और नफ़रत भरी बातें शेयर करने में.. वो यही नहीं चाहते हैं.. और फिर नशे की ख़ुराक़ उन्होंने इतनी ज़्यादा बढ़ा दी कि अब आपके "आंख" का पानी भी सूख गया.. अब आपको फ़र्क ही पड़ना बन्द हो गया है कि ऐसे स्टेटस या पोस्ट से आपका कोई दोस्त आहत भी होगा.. अब आपको बस नशा करना होता है क्योंकि अब इस नशे के बिना चैन नहीं है,, ये नशा बहुत ज़रूरी है आपके लिए 

मेरी सोसाइटी का ग्रुप है.. जहां कई मुस्लिम परिवार भी हैं.. मगर उस ग्रुप में दिन रात मुसलमानों के लिए नफ़रत परोसी जाती है.. एक बार एक सोसाइटी के मेंबर ने उसमें एक भद्दी सी कविता डाली.. जिसमे मुस्लिम औरतों को लेकर भद्दी भद्दी गाली दी गयी थी.. "सलमा और रज़िया का हुवा हलाला".. इस टाइप से थी वो कविता कुछ.. मैं अपने आपको रोक नहीं सका और एतराज़ किया.. बहुत कड़े शब्दों में एतराज़ किया.. दो सौ ग्रुप मेम्बेर्स में से तुरंत दो तीन लोग "नशे" से थोड़ी देर के लिये बाहर आये और बोले कि "हां ये सही नहीं है,  शर्मा जी आप इस कविता को हटाइये".. शर्मा जी ने आधे घंटे बाद कहा कि वो कविता इस ग्रुप में ग़लती से पोस्ट हो गयी थी, इसे दरअसल वो अपने परिवार वाले ग्रुप में पोस्ट कर रहे थे.. मुझे इसी सोसाइटी में रहना है इसलिए मैंने उन्हें धन्यवाद दिया कि उन्होंने हटा लिया.. बात ख़त्म हो गयी

अब शर्मा जी फ़ेसबुक पर होते तो मैं उनसे पूछता कि ये कविता आप अपने  परिवार वाले ग्रुप में क्यूं पोस्ट कर रहे थे? अपने बच्चों और परिवार को इस कविता के माध्यम से आप क्या समझाना चाह रहे थे? मुसलमानों के ऊपर लिखी ऐसी भद्दी कविता आपके परिवार को क्या सीख देगी? शर्मा जी मेरे टोके जाने के बाद से अभी तक नाराज़ हैं और रह रह कर मेरे नाम से कटाक्ष करते हैं जबकि मैं कभी कोई जवाब नहीं देता हूँ उन्हें
जिस नशे में शर्मा जी ने वो भद्दी कविता पोस्ट की थी, वो नशा बहुत गहरा है.. गाली दे कर मुसलमानों को भीतर बहुत गहरा सुख मिलता है और उस नशे की क़ीमत पर इन्होंने अपनी सारी जनरेशन को दांव पर लगा दिया है.. 

इन जैसे लोग अब जैसे ही परेशान होते हैं पाकिस्तान की बुराई सुनकर ख़ुश हो जाते हैं.. जैसे ही यहां अर्थव्यवस्था गिरती है फ़ौरन न्यूज़ चैनल इनको पाकिस्तान की बदहाली दिखाते हैं.. वहां ग़रीबी और भुखमरी दिखाते हैं.. इनके व्हाट्सएप्प पर आई टी सेल इन्हें पंचर बनने वाले मुसलमानों का जोक भेजते हैं.. बस ये अपनी  अर्थव्यवस्था और अपने बिज़नेस में हुवे घाटे को भूलकर "ख़ुश" हो जाते हैं.. और यही वजह है कि इस नशे की लत इनको इतनी बुरी तरह से लग चुकी है कि अब सरकार कुछ भी करे, कितनी भी ख़राब नीतियाँ बना दे,  इनसे कोई मतलब नहीं.. क्योंकि जैसे ही ये होश में आना शुरू होते हैं तुरंत एक न एक कांड या क़ानून मुसलमानों को घेर लेता है, बस ये इसे  अपने परिवार और व्हाट्सएप्प ग्रुप ख़ूब शेयर करते हैं.. ख़ूब हँसते हैं और सारे दुख भूल जाते हैं
मगर अब ये नशा :गंभीर” बीमारी बन चुका है.. क्यूंकि पहले ये शुरू हुआ था "आतंकवाद" से लड़ाई के लिए.. मगर अब ये एक कम्युनिटी से नफ़रत में बदल चुका है.. और इस नशे की इन्हें लगातार डोज़ चाहिये होती है.. और अब हर दिन इन्हें नई तरह से मुसलमानों को प्रताड़ित देखना होता है.. क्योंकि एक तरह के खेल से ऊब जाते हैं ये.. इनको इसमें नया इंटरटेंमेंट चाहिये होता है.. तभी सरकार "डिटेंशन कैम्प" वग़ैरह आइडियाज़ के साथ आती है  और उसमें इनको बड़ा मज़ा आता है.. अब हिंसा पसंद करने का पैमाना बढ़ता जा रहा है.. जितनी ज़्यादा एक  कम्युनिटी के प्रति जो ज़हर उगलेगा, उसकी उतनी ज़्यादा जय जयकार होगी अब.. जो जितना खूँखार शेर बनकर फ़ेसबुक और व्हाट्सएप्प पर अपने को दिखा दे ये उसे उतनी ही बड़ी मात्रा में फॉलो और लाइक करते हैं अब.. अब शालीन लफ़्ज़ों में एक कम्युनिटी की बुराई बात करने वालों को ये नहीं पसंद करते हैं.. इन्हें गाली निकालने वाले, हिंसक और खूँखार लफ़्ज़ों में बात करने वाले पसंद आते हैं.. क्योंकि नशा अब पुराना हो चुका है.. अब दो चार पैग में मज़ा नहीं आता है.. अब पूरी बोतल चाहिये होती है इन्हें और वो भी नीट.. ये नशा बहुत ज़रूरी है 

हालात अब ऐसे हैं कि अब कोई भी "मुसलमान" जो अच्छी बात करे, वो इन्हें बिल्कुल नहीं भाता है.. उसे ये छिपा जिहादी, अल तकिया करने वाला और जाने क्या क्या बोलेंगे.. क्यूंकि जो नशा ये कर रहे हैं उसमें कहीं भी "अच्छे मुसलमान" की कोई जगह नहीं होती है.. सिर्फ़ खूंखार आतंकवादियों को ये whatsapp में मैसेज के द्वारा गेम खेल कर धराशायी करते हैं और फिर इन्हें अपने आसपास सब आतंकवादी दिखते हैं.. ये नशा बहुत गहरा है 
बीते तीन दिनों से UAE की राजकुमारी प्यार और मुहब्बत की बातें कर रही हैं, भारत और UAE के अच्छे रिश्तों की बात कर रही हैं.. और ये उन्हें उनके ट्विटर एकाउंट पर जा कर गाली दे रहे हैं.. भारत का किसी भी अरब देश से कभी भी ख़राब संबंध नहीं रहा है.. यहां तक कि बहुत ही मधुर संबंध रहा है.. मगर अब इन्होंने ये सीख लिया है कि मुसलमान नाम देखो और गाली निकालना शुरू कर दो.. ताबिश सिद्दीकी है मतलब इसको गाली निकालनी है.. एमिरत की राजकुमारी हैं, अरबी नाम है.. इसलिये वो अच्छी बात नहीं कर सकती है.. उसे बस गाली देना है जैसे अपने देश के अरबी नाम वालों को हम दिन रात अपने परिवार के साथ गाली देते हैं.. किसी भी अरबी ने या एमिरत वाले ने इनके किसी भगवान, किसी भी इष्ट को कभी कोई गाली नहीं निकाली है मगर कल इन्होंने राजकुमारी के एकाउंट पर जा कर उस से कहा कि "तुम्हारा धर्म गधों वाला धर्म है".. ये बात एक टीवी चैनल से बात करते हुवे राजकुमारी कह रही थी कि "मैंने अपने जीवन मे ऐसे भारतीय तो कभी देखे ही नहीं हैं"


अफ़सोस होता है देखकर.. और यक़ीन मानिए मुझे न तो अपनी सोसाइटी के शर्मा जी से कोई नफ़रत है और न ही आपसे.. मुझे बस दुःख होता है.. मगर ये मैं कहूँ अब कि दुःख होता है तो उसमे भी आप में से बहुत लोग “ख़ुश” होंगे.. क्यूंकि आपके हिसाब से एक अरबी नाम वाला दुखी है.. और ये आपको एनर्जी देगा.. कम से कम एक पैग का नशा तो देगा ही.. क्यूंकि ये नशा बहुत गहरा है 

ये नशा सच में बहुत गहरा है.. बहुत ही गहरा.. और अब ये नफ़रत नहीं है.. ये नशा है 



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