पाकिस्तान की इस्लामिक जमात क्यूँ दूसरे धर्मों के लोगों को धर्मांतरण के लिए बाध्य कर रही हैं?

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Why Sikh community is being targeted in pakistan?

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पाकिस्तान के हंगू ज़िले के सिखों ने ये आवाज़ उठायी है कि उन्हें ज़बरदस्ती धर्मान्तरित किया जा रहा है.. उन पर बहुत दबाव बनाया जा रहा है कि वो सब इस्लाम कुबूल कर लें.. गिने चुने सिख हैं हंगू जिले में मगर वो भी इस ज़िले के लगभग सौ प्रतिशत इस्लामिक कट्टरपंथियों से बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं.. भारत सरकार ने इस पर संज्ञान लिया है और पाक उच्चायोग से बात करने की बात कही है 

पाकिस्तान की कुल आबादी लगभग बीस करोड़ के आसपास है.. और कुल आबादी का लगभग छियान्नबे (96%) लोग मुसलमान हैं.. बीस करोड़ लोगों में छत्तीस (36) लाख के क़रीब हिन्दू रहते हैं पाकिस्तान में.. अट्ठाईस लाख के क़रीब इसाई हैं और कुल बीस हज़ार सिख रहते हैं पकिस्तान में
बीस करोड़ लोगों के बीच में सिर्फ और सिर्फ क़रीब साठ लाख के क़रीब ही ऐसे लोग हैं जिनका धर्म इस्लाम नहीं है.. बाक़ी सब इस्लाम के ही मानने वाले हैं.. मगर ये कुल साठ लाख "ग़ैर मुस्लिम" लोग पाकिस्तानी कट्टरपंथियों की आँख में खटकते रहते हैं और ये इसी उधेड़बुन में लगे रहे हैं कि कैसे इन सबको मुसलमान बना लिया जाय

ये किस तरह की विचारधारा है जो इस क़दर प्यासी है अपने धर्म में लोगों को घसीटने के लिए.. इसाईयत भी लोगों को अपने धर्म में घसीटने को आतुर रहती है मगर वो सेवा और लालच से इसे अंजाम देते हैं मगर मुसलमानों के साथ ऐसा क्या है जो उन्हें किसी भी तरह से दूसरों को अपने धर्म में लाने को मजबूर करता है?

एक छोटी सी घटना है मेरे जीवन की.. भारत की घटना है ये.. मैं अपनी पत्नी अपने एक बेटे और अपने मुह बोले "साले" के साथ एक ट्रेन द्वारा एक सफ़र पर था.. तीसरे दर्जे के AC के जिस डब्बे में हमारा रिजर्वेशन था उसी डब्बे में एक जमात सफ़र कर रही थी.. जमात एक तरह का इस्लामिक संगठन होता है जिसका काम दूर दराज़ के इलाकों में जा कर इस्लाम का प्रचार प्रसार करना होता है.. जमात के लोगों को पहले तो लगा नहीं हम लोग मुसलमान है, क्यूंकि मेरी पत्नी बुर्क़ा ओढती नहीं है.. मगर फिर कुछ बातचीत के बाद वो लोग जान गए कि हम मुसलमान हैं और फिर उनके साथ चलने वाले संगठन के बड़े लोगों का सारा ध्यान हम पर लग गया.. उन्हें लगा कि चूँकि हम लोगों को देखकर कोई ये नहीं बता सकता है कि हम लोग मुस्लिम हैं इसलिए शायद हम लोगों को और ज्यादा मुसलमान बनने की ज़रूरत है.. इसलिए वो हमे इस्लाम समझाने लगे.. वो हदीसें सुनाने लगे मुझे और पर्दा और दाढ़ी की अहमियत समझाने लगे.. आखिर उनकी बातों से तंग आ कर मैंने इस्लाम पर बोलना शुरू किया.. मैंने हदीसें सुनायीं और इस्लाम के इतिहास पर बातें करने लगा.. मेरी बातों से वो लोग इतने ज्यादा प्रभावित हो गए कि दूसरे डिब्बे में भी जो उनके लोग बैठे थे उनको भी काल करके बुला लिया कि आ जाओ और ताबिश की बातें सुनों.. ज़ाहिर सी बात है मैं उनके मन के इस्लाम की बात कर रहा था बिना किसी विरोध के जो उनके लिए बड़ी नयी बातें थीं.. सारे नौजवान जमाती बड़े ध्यान से मेरी बात सुन रहे थे.. कुछ देर बोलने के बाद मैं अपनी सीट पर वापस आ गया और फिर वो लोग आपस में मेरी बातों पर बहस करने लगे

मेरा मुंह बोला साला उन्ही के पास बैठा रह गया तो उन लोगों ने उसे घेर लिया और उसे इस्लाम समझाने लगे.. वो बस हाँ हाँ करता रहा.. मुझे लगा कि अब ये उसके लिए ज्यादा हो रहा है तो मैंने कहा कि "अरे मौलाना साहब.. ये हमारे साले साहब गुप्ता हैं.. आप इनसे थोड़ा कम उर्दू में बात कीजिये".. इसको सुनकर वो सारे एकदम अचंभित हो गए.. और उनके हेड मौलाना के आखों में एक चमक सी आ गयी.. बाद में जब मैं टॉयलेट की तरफ गया तो जमात के हेड ने मेरा पीछा किया और टॉयलेट के पास मुझे पकड़ लिया और मुझ से कहने लगा "ताबिश साहब.. हम तो जान ही नहीं पाए कि आपका साला मुसलमान नहीं है".. मैंने उन्हें समझाया कि वो मेरा परिवार है.. और उसका परिवार मेरा परिवार है.. तो मौलाना मुस्कुराए और मुझ से कहा "फिर तो आप बहुत अच्छा काम कर सकते हैं कौम के लिए ताबिश साहब.. आपको पता है कि एक काफ़िर को मुसलमान बनाने का कितना बड़ा सवाब देता है अल्लाह मियां?"

मैंने कहा कि "अगर मेरा साला मुझ पर भरोसा करता है तो मैं उसके साथ ये करूँ कि उसको धीरे धीरे मुसलमान बना दूं?"

कहने लगे "इसमें हर्ज क्या है? उसको नेक और सही रास्ते पर लगा कर आप उसको कितने गुनाहों से बचा सकते हैं आपको पता है? आप क्या चाहेंगे कि आप जिसे इतना चाहते हैं वो आपक सामने जहन्नम की आग में फ़ेंक दिया जाए?"

मैंने उनसे पूछा "कि क्या आप ये दावे से कह सकते हैं कि आप जन्नत जायेंगे?"

कहने लगे "नहीं, मगर मैं इस बात का दावा कर सकता हूँ कि अगर आपने एक इंसान को मुसलमान बना लिया तो आप जन्नत में पक्का जायेंगे"
अब तक मैं गुस्से से भर चुका था.. मैंने उनसे कहा "आप मुझे बहुत अछे इंसान लगे.. आपकी बातें मुझे पसंद आई थीं मगर ये बात जो आपने कही है इस वजह से मुझे आपसे घिन हो गयी है.. आप जैसे लोग इंसान नहीं होते हैं मौलाना वो बस मुसलमान होते हैं.. और रिश्तों की समझ तो आपको बिलकुल है ही नहीं.. आपको पता है एक बात, कि अगर मैं अपने मुह बोले साले से प्यार करता हूँ तो मैं उसके कहने पर हिन्दू बन सकता हूँ मगर उसको कभी धोखे से मुसलमान बना कर मैं ज़िंदा नहीं रह पाऊंगा.. आप क्या जाने मुहब्बत मौलाना.. जाईये अपनी सीट पर बैठिये चुपचाप"

मौलाना साहब एकदम चुप हो गए.. वो समझ गए थे कि उनके इस्लाम की मेरे लिए क्या अहमियत है.. मैं जब अपनी सीट पर वापस आया तो वो मुझे मक्खन लगाने लगे मगर फिर मैंने उनसे बात ही नहीं की.. जब उनका स्टेशन आया तो जमात के सारे लोग मुझ से हाथ मिला कर जाने लगे तो अंत में मौलाना ने हाथ मिलाया और कहा कि ट्रेन से बाहर चलिए, मेरा बेटा स्टेशन पर आया है मैं चाहता हूँ कि आप उस से मिलें".. मैंने कहा "नहीं.. मुझे अब किसी से नहीं मिलना है... आप आगे से इसका ख़याल रखियेगा क्यूंकि आपकी  इस हरकत से आपने इस्लाम नहीं फैलाया है बल्कि अपनी इस्लामिक जमात के लिए एक और घुर विरोधी पैदा कर दिया है".. मौलाना चुपचाप नज़र झुका कर ट्रेन से उतर गए

मैं अपनी सीट पर वापस लेट गया और नीचे अपने साले को अपने बेटे के साथ खेलता हुवा देख रहा था.. कोई देख कर जान ही नहीं सकता था कि मेरे बेटे और मेरे साले में से किसका कौन सा धर्म है.. मैं बहुत देर तक उसे देख कर सोचता रहा कि उस मौलाना ने शायद ही मेरे साले को इंसान की तरह जानने की कोशिश की हो.. उसने शायद ही ये सोचा हो कि जो इंसान मेरा परिवार है उसमे क्या ख़ास बात होगी और उसे थोड़ा और जाना जाया.. उस मौलाना को मेरा साला सिर्फ़ और सिर्फ़ एक "ग़ैर मुस्लिम" दिखा जिसे इस्लाम में घसीट लेना चाहिए और जन्नत पा लेनी चाहिए

ये किस तरह के रोबोटिक लोग होते हैं.. ये किस नज़र से दुनिया देखते हैं.. इस घटना ने मुझे हिला कर रख दिया था भीतर तक.. बाद में मेरे साले ने मुझ से पूछा कि क्या हुवा था.. क्यूंकि उसने मेरा गुस्सा देख लिया था मौलाना के ऊपर.. मैंने उसको सब बताया तो वो कहने लगा "क्या हुवा.. बोल देते कि मैं मुसलमान हूँ".. मैंने कहा "क्यूँ बोल देता कि तुम मुसलमान हो? क्यूँ ऐसी बातों को टाला जाए आखिर? क्यूँ नहीं ये लोग ये बर्दाश्त कर सकते हैं कि एक "ग़ैर मुसलमान" भी मेरा परिवार हो सकता है? क्यूँ नहीं इनकी हिम्मत पड़ती है कि जा कर शाहरुख़ खान को ये बोलें कि अपनी पत्नी गौरी को वो मुसलमान बनाये? ये लोग आम आदमियों को ही टारगेट करते हैं और आम आदमियों के शोषण में ये अपनी जन्नत ढूंढते हैं"

ये घटना करीब पांच साल पुरानी है.. मगर बहुत कीमती घटना है जिस से ये समझा जा सकता है कि इस सब के पीछे क्या मानसिकता काम करती है.. और मानसिकता कुछ और नहीं.. बस जन्नत.. एक इंसान को मुसलमान  बनाने के पीछे जन्नत पक्की हो जाती है मौलानाओं के हिसाब से.. अब जितने भी नौजवान उस जामत में होंगे उन सब को यही सिखाया और पढ़ाया जाता है.. और फिर वो इसी प्रचार को आगे बढाते हैं और इसी तरह से ये सारा समाज दूषित होता चला जाता है

यहाँ भारत में तो इनकी सोच पर लगाम होती है.. मगर पाकिस्तान में इनको खुला मैदान मिल गया है जहाँ ये जितना चाहें अपने धर्म का प्रचार प्रसार करें और जिस हद तक भी जाना चाहें उस हद तक जाएँ.. ऐसे ही इन्होने हर इस्लामिक देश में किया और इतने आसपास इतने मुसलमान होने पर भी चैन सिर्फ़ इसलिए नहीं मिल रहा है क्यूंकि जन्नत की सीट पक्की हो जाती है किसी गैर मुसलमान को मुसलमान बनाने से.. इनकी जन्नत की इस चाहत ने सारी  पृथ्वी नरक कर दी है मगर ये हवाई भूख इनकी ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही है

ये जो गिने चुने सिख हैं पाकिस्तान के हंगू जिले में.. वो सब जन्नत का टिकट हैं इन कट्टरपंथियों का.. और इस टिकट को भुनाने के लिए ये कुछ भी कर सकते हैं.. इनकी सोच और समझ इस हद तक दूषित होती है कि आम इंसान और दूसरी कौमें शायद ही इसे कभी समझ सकें.. ये जन्नत पाने के लिए ही चर्च में बम बाँध कर फट जाते हैं और मासूमों को ट्रक से रौंद देते हैं.. ये भूल जाते हैं कि इनके ऊपर पहुँचने पर इन्हें अपनी जन्नत में खून की नदियाँ मिलेंगी.. दूध की नहीं

~ताबिश 
  
  



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