अगर ऐसा ही रहा, तो ख़त्म हो जायेगें शिया!

  उड़ते तीर You are here
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अगर ऐसा ही रहा, तो ख़त्म हो जायेगा शिया!

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14 सितम्बर 2017 को इराक़ में शिया तीर्थयात्रियों को बम विस्फोट और गोलियों से मारा गया। जिसमें लगभग 74 लोगों की‌ मृत्यु हो गयी‌। इराक़ में शियाओं का जिस तरह धीरे-धीरे ख़ात्मा किया जा रहा है वो सोचने का विषय है। आई एस आई एस ने भी शियाओं के टारगेट कर मारना शुरू किया था। जब बहुत चर्चा हो रही थी आई एस आई एस के बारें में तो एन डी टी वी प्राईम टाइम में किसी मुस्लिम शिया स्कॉलर को बुलाया गया था तो उनका कहना था कि आई एस आई एस ने इराक़ से शियाओं को लगभग ख़त्म कर दिया है। उन्होंने ज़्यादातर शियाओं को ही टारगेट किया है। उनका कहना एकदम सही है क्योंकि पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान तक सिर्फ शियाओं को मारा जाता है और इस पर दुनिया भर के शिया ख़ुद चुप्पी साधे रहते हैं और जो ख़िलाफ़त करते हैं तो उनके सपोर्ट में कोई आता ही नहीं।

अगर ऐसा ही रहा था तो ख़त्म हो जायेगा शिया

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निर्म-अल-निर्म एक शिया स्कॉलर जो की सऊदी अरब में रहते थे और उन्होंने वहां के राजशाही नियमों के लिये कहा था कि ये इंसानियत के विरूद्ध हैं और जब हर देश में राजा का राज ख़त्म हो चुका है तो यहां भी ख़त्म होना चाहिये तो उनको फांसी पर चढ़ा दिया गया और ऐसे ही कुछ साल पहले एक शिया लड़की से सऊदी अरब में रेप हुआ जबकि वहां रेप के लिये मौत की सज़ा है लेकिन वो लड़की शिया थी इसलिये उसको ही सौ कोड़ों की सज़ा सुनायी गयी।

बहुत से लोग कहते हैं न कि मुस्लिम धर्म में जातिवाद नहीं है छुआछूत नहीं है। तो ये सब क्या ये जातिवाद के बराबर ही है।

भारत में लखनऊ में सबसे ज़्यादा शिया रहते हैं और लोगों से सुना है और ख़ुद देखा है लखनऊ में हिन्दू-मुस्लिम दंगे न के बराबर ही हुये होंगे। लेकिन बचपन से लेकर आजतक मैंने कम से कम बीस बार शिया-सुन्नी दंगे देखे हैं।

ज़यादातर कट्टर सुन्नी ही दंगों के लिए ज़िम्मेदार समझे जाते है, क्योंकि दंगे हमेशा तब होते जब मोहर्रम का जुलूस निकल रहा होता था और वो जैसे ही सुन्नी इलाके से निकलता था तो कोई न कोई ऐसी हरकतर होती थी। जिससे दंगे होते थे। क्योंकि लखनऊ में इतने शिया होने के बाद भी हर बार शिया ही ज़्यादा मारे जाते थे। दंग कैसे भड़कते हैं,'सुन्नी इलाको में सुन्नी मुस्लिम अपनी छतों पर अध्धे और गुम्मे इकट्ठा कर लेते थे और जब शिया अपना जुलूस लेकर उनके इलाकों से निकलते थे कोई ताजि़या पर गुम्मा फेंक देता था और जिसके बाद शिया भड़क जाते थे और सुन्नियों को मौक़ा मिल जाता था लड़ाई का और वो अपनी छतों से अध्धे फेंकने लगते थे वरना आप ख़ुद सोचिये छतों पर इतने अध्धे कैसे आते। अगर ये सोची-समझी हरकत न होती। ये कोई हवाई बात नहीं है ये सच है।'

शिया और सुन्नियों लड़ाई सदियों से चली आ रही है, पता नहीं कब तक चलेगी। भाईचारा बढ़ाने के लिये समय-समय पर शिया-सुन्नी एक साथ नमाज़ अदा करते हैं ईद और बकरीद के मौके पर लेकिन हालात कहीं नहीं सुधरे हैं। शियाओं का कत्लेआम हो रहा है और सब मूक बने देख रहे हैं।



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