बच्चे नहीं... इलेक्ट्रॉनिक बच्चे!

  उड़ते तीर You are here
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बच्चे नहीं... इलेक्ट्रॉनिक बच्चे!

हम अक्सर अपने घरो में देखते है, की जो छोटे बच्चे होते है लगभग 2 से 6 साल की उम्र के वो बहुत ही फ़ास्ट होते है  चीज़ो को सिखने के मामलों में.
जैसे-जैसे हमारी टेक्नोलॉजी बढती जा रही है, वैसे-वैसे हमारे बच्चे भी इलेक्ट्रोनिक होते जा रहे है, मतलब उनका इलेक्ट्रोनिक डिवाइसेस में इंटरेस्ट बढता जा रहा है और वो उसे ऐसे ट्रीट करते है जैसे उनका प्लेयिंग टॉय हो.

कोई भी नई डिवाइसे जो घर में आती है, बच्चे उसे घर के बड़ो से ज्यादा जल्दी सीख जाते है और उसके बाद शुरू होती है, उनकी दादागिरी. जिसे देख कर सभी शौक्ड रहा जाते है..और तो और उससे रिलेटेड जो भी नई इनफार्मेशन मार्किट में आती है उन्हें सबसे पहले पता होती है. 

आज की जनरेशन के बच्चे किसी लेटेस्ट कप्यूटर जनरेशन से कम नहीं है, वो होते छोटे-छोटे है, जिन्हें देख कर लगता है की अभी आप इन्हें बुद्दू बना लेंगे लेकिन उससे पहले ही वो आप को चरा कर निकल जाते है.

वैसे जिस स्पीड से हर दिन कुछ न कुछ नया दुनियाँ में हो रहा है, बच्चो के लिए ये जरूरी भी है, की वो अपना दिमाग़ हर उस चीज़ में लगाएं जिसे वो इंजॉय करते है, जिससे बच्चे बचपन से ही कुछ न कुछ नया आजमाते रहें..

ऐसे ही ये कुछ बच्चो की करामाते है, हमें इन्टरने पर मिली. 

बच्चे नहीं... इलेक्ट्रॉनिक बच्चे!

इस बच्चे ने अपने पेरेंट्स से घर पर थिएटर बनाने की ज़िद की और पेरेंट्स ना मानने पर घर पर ही अपना ख़ुद का होम थियेटर बना कर दिखाया. पेरेंट्स का कहना था की, उनके बच्चे को हर फिल्म थियेटर में देखने का शौक है, तो उसने अपने लिए खुद का थिएटर ही बना लिया, और वो उसमे बड़े मज़े से अपनी फ़ेवरेट फ़िल्म देखता है.

बच्चे नहीं... इलेक्ट्रॉनिक बच्चे!

इन जनाब को इत्ती सी उम्र में यूट्यूब का ऐसा शौक है की ये दिन भर बस उसी में जुटे रहते है, कभी टैब के ऊपर, तो कभी टैब के नीचे. सुबह उठने से लेकर शाम तक बस यूट्यूब. इनके कुछ फेवरेट म्यूजिक भी ये ज्यदा तर उसी को सुनना पसंद...

बच्चे नहीं... इलेक्ट्रॉनिक बच्चे!

ये कारनामा एक 10 साल के बच्चे का है. जिसे साईकिल का बहुत शौक है और जब इसकी साईकिल किसी एक्सीडेंट में टूट गई, तो घर वालो की डाट से बचने के लिए उसने साईकिल को नया लुक ही दे दिया..

बच्चे नहीं... इलेक्ट्रॉनिक बच्चे!

बच्चे बहुत ही मासूम होते है, उनकी इसी मासूमियत के चलते कभी खेल-खेल में, तो कभी प्यार में, तो कभी किसी के डर से उनकी क्रिएटिविटी सामने आ ही जाती है. पेरेंट्स का भी ये फ़र्ज़ बनता है, की बच्चो के ऐसे कामों को सराहे, उनके टैलेंट को बचपन से ही बढने दे..
क्या पता इस संभावनाओ के दौर में, आप का बच्चा खेल-खेल में ही कुछ नया ही इन्वेंट करले....

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